गुनाहों का देवता" धर्मवीर भारती का एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जो प्रेम, त्याग और समाज के मूल्यों पर आधारित है। इसकी कहानी काफी भावनात्मक और गहराई से भरी हुई है।
पिछले दिनो इसको फिर से पढ़ने का मौका मिला। हमे बेहद पसंद हैं ये सुधा और चंदर की कहानी। पहली बार जब पढ़े थे तो सिर्फ़ कोर्स बुक की तरह पढ़ी थीं। फिर दो तीन बार और पढ़ी, हर बार इस कहानी से प्यार होता गया। ऑनलाइन फोन से पढ़ना और बुक से पढ़ने में अंतर है। बुक पढ़ने में ज्यादा अच्छा लगता है।
हां तो बात हो रही थी सुधा और चंदर की इस कहानी को थोडा सा उल्ट फेर कर के हम लिख रहे हैं। भाग छोटा ही हुआ करेगा क्योंकि थोडा बोलकर फिर थोडा टाइप करके इतना ही टाइम निकल पाएगा हमसे। थोड़ी बहुत आउट ऑफ लिमिट्स भी है 🫣तो कहानी के अनुरूप थोडा एडजस्ट कर लेना। कुछ गलत लगे तो क्षमा।
प्रेम कभी-कभी उन गलियों में भटक जाता है, जहां रिश्तों के नाम बदल जाते हैं। चाहत, समर्पण और त्याग के बीच डगमगाता मन... कभी किसी की खुशी के लिए अपनी ख्वाहिशों को भूल जाना भी प्रेम का ही रूप है। यही तो किया था चंदर ने... और शायद यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।
वाराणसी की वो संकरी गलियां, जहां हर मोड़ पर कहानियां सांस लेती थीं... उन्हीं गलियों के एक शांत-से घर में रहते थे डॉ. शुक्ला। उम्र के उस पड़ाव पर जब इंसान अपने अकेलेपन का साथी ढूंढ़ने लगता है, डॉ. शुक्ला को उनका शिष्य चंदर बेटे की तरह संभाल रहा था। चंदर... जो न किसी से ज्यादा बोलता था, न ज्यादा हंसता था। मगर उसका दिल इतना बड़ा था कि उसमें हर किसी के लिए जगह थी — खासकर सुधा के लिए।
सुधा... डॉ. शुक्ला की बेटी, खिलखिलाती धूप जैसी लड़की। उसकी हर बात में एक मासूम-सा अधिकार झलकता था, खासकर जब वो चंदर के सामने होती थी। वो हंसी-ठिठोली करती, रूठती-मनाती और चंदर उसकी हर बात को अपनी चुप्पी में समेट लेता।
शायद चंदर जानता था कि उसके दिल में एक चाहत ने घर कर लिया है — मगर यह चाहत वही थी, जिसे समाज 'गुनाह' कहता है।
...और यही कहानी है उस गुनाह की, जो देवत्व से कम नहीं था।
कुछ कहानियां शब्दों में नहीं, एहसासों में लिखी जाती हैं... और कुछ रिश्ते नामों के मोहताज नहीं होते। ये कहानी है उस प्रेम की, जो अधूरा होकर भी पूरा था... उस त्याग की, जो गुनाह होकर भी पवित्र था... और उन एहसासों की, जो कहे बिना भी सुनाई देते थे।
डॉ. शुक्ला का स्नेह दो जगह बंटा था — उनकी बेटी सुधा और उनके प्रिय शिष्य चंदर।
सुधा... चंचलता का दूसरा नाम। उसकी हंसी घर के आंगन को गुलजार कर देती थी। उसकी आंखों में शरारत और दिल में मासूमियत भरी थी। वो नन्ही चिड़िया की तरह थी, जो हर फिक्र से परे, बस अपनी धुन में उड़ती रहती थी।
चंदर... गंभीर, परिपक्व और जिम्मेदार नौजवान। बचपन में ही मां-बाप को खो चुका था, मगर अपनी मेहनत और लगन से उसने खुद को मजबूत बना लिया था। उसके जीवन में भावनाओं का बहुत गहरा स्थान था — खासकर सुधा के लिए।
फिर थी बिनती, सुधा की छोटी बहन, जो उसकी हर शरारत में साथ देती थी। जहां सुधा के मन में अल्हड़पन था, वहीं बिनती में दुनियादारी समझने की परिपक्वता थी।
और इन सबके बीच थीं मिस शुक्ला, डॉ. शुक्ला की बहन, जिनके लिए नियम-कायदे सबसे ऊपर थे। वो परिवार के आदर्शों और समाज के नियमों का सख्ती से पालन करती थीं।
उस शाम सूरज ढल रहा था। घर के आंगन में नीम के पेड़ की छांव में चंदर एक किताब लिए बैठा था। सुधा पास ही बैठी थी — बेमन से पढ़ाई कर रही थी, मगर उसकी निगाहें बार-बार चंदर पर जा टिकतीं।
"भइया!" सुधा ने झुंझलाते हुए किताब बंद कर दी।
"क्या हुआ?" चंदर ने बिना सिर उठाए पूछा।
"आप हर बात में टीचर क्यों बन जाते हैं?"
चंदर ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्योंकि तुम पढ़ाई के नाम पर सिर्फ बहाने बनाती हो!"
"अच्छा! तो अब मैं बहानेबाज़ भी हो गई?" सुधा ने आंखें मटकाईं।
डॉ. शुक्ला बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। उन्होंने हल्के स्वर में कहा, "चंदर, सुधा की शरारतों को सिर पर मत चढ़ाओ।"
चंदर ने आदर के साथ सिर झुका दिया, "जी बाबूजी।"
सुधा ने चुपके से चंदर की ओर देखा। उसकी आंखों में जाने कैसी हलचल थी — शायद वो कुछ कहना चाहती थी, मगर शब्द रास्ता नहीं पा रहे थे।
"कभी-कभी रिश्तों की सबसे गहरी सच्चाई वही होती है, जो सबसे अधिक छुपाई जाती है।"
सूरज ढल चुका था। वाराणसी की गलियों में शाम के दीयों की हल्की लौ टिमटिमा रही थी। घर के आंगन में नीम का पेड़ ठंडी छांव बिखेर रहा था। सुधा आंगन में पड़ी चारपाई पर लेटी थी, उसकी नजरें आसमान पर टिकी थीं — मगर उसके मन का आकाश कहीं और भटक रहा था।
उसे याद आ रहा था वो दोपहर का वाकया, जब चंदर ने उसे झिड़का था।
"तुम हर बात में इतनी लापरवाह क्यों हो सुधा?"
सुधा को झुंझलाहट हुई थी। मगर उसकी झुंझलाहट चंदर के शब्दों पर नहीं, उसके रूखेपन पर थी।
आंगन के एक कोने में चंदर बैठा पढ़ रहा था, मगर सुधा को पता था कि उसका ध्यान किताब में कम और उसके इर्द-गिर्द ज़रूर लगा होगा।
सुधा धीरे से उठी और चुपके से उसके पास पहुंची। किताब के पन्नों पर उंगलियां फिराते हुए बोली, "कौन-सी किताब है भई, जो मुझसे ज्यादा प्यारी लग रही है?"
चंदर ने बिना सिर उठाए कहा, "सुधा, तुम कब समझोगी कि हर बात मजाक की नहीं होती?"
"ओहो!" सुधा ने नकल उतारते हुए कहा, "हर बात मजाक की नहीं होती... ये तो आप रोज़ ही कहते हैं। कभी हंसना भी सीखिए!"
चंदर मुस्कुरा पड़ा, "अगर मैं भी तुम्हारी तरह मस्ती में लग गया तो तुम्हें डांटने वाला कौन रहेगा?"
सुधा ने हल्की सी ठंडी सांस भरी। उसकी आंखों में हल्की नमी थी, मगर उसने मुस्कान से उसे छुपा लिया।
"पर कभी-कभी डांट के पीछे जो अपनापन होता है न भइया... वो बहुत अच्छा लगता है," सुधा की आवाज़ धीमी थी, मगर चंदर सुन चुका था।
चंदर ने उसकी ओर देखा। सुधा की आंखों में एक मासूमियत थी, मगर उसके भीतर कुछ और भी था — कुछ ऐसा जिसे चंदर जान-बूझकर नज़रअंदाज़ करता आ रहा था।
रात का खाना खत्म हो चुका था। डॉ. शुक्ला बरामदे में टहल रहे थे। चंदर उनके पास आकर खड़ा हो गया।
"कुछ कहना था बाबूजी," चंदर ने हिचकते हुए कहा।
"हां बेटा, बोलो।"
"सुधा की पढ़ाई को लेकर कुछ कहना चाहता था... वो अब बड़ी हो रही है, और..."
डॉ. शुक्ला ने गंभीर स्वर में कहा, "चंदर, मैं भी यही सोच रहा था। सुधा अब बड़ी हो गई है... और बड़ी होती लड़की के लिए समाज के अपने नियम होते हैं।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि मुझे अब उसके विवाह के बारे में सोचना चाहिए," डॉ. शुक्ला का स्वर संयत था।
चंदर का दिल धक से रह गया। उसने अपनी भावनाओं को संभालते हुए कहा, "पर अभी तो... सुधा बहुत छोटी है बाबूजी।"
डॉ. शुक्ला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "छोटी तो नहीं रही बेटा... और लड़की की शादी में देर करना ठीक नहीं होता।"
चंदर चुप हो गया। उसने सिर झुका लिया, मगर उसके मन में हलचल तेज हो चुकी थी।
कमरे में सुधा खिड़की के पास बैठी थी। उसकी आंखों में उम्मीद का उजाला था।
"कहीं चंदर भइया भी मुझसे... वही महसूस करने लगे हों जो मैं उनके लिए करती हूँ?" उसने खुद से सवाल किया।
मगर अगले ही पल उसे चंदर के गंभीर चेहरे की याद आई — उसकी हर बात में बस फर्ज, जिम्मेदारी और अनुशासन झलकता था।
"पर... अगर वो मुझे मना कर दें तो?"
उसकी आंखों में हल्की नमी उतर आई थी।
मिलते हैं अगले भाग में सुधा और चंदर के साथ