विक्रांत राठौड़।
वो कोई नेता नहीं था,
ना पुलिस की वर्दी में था,
फिर भी हर थाने के इंचार्ज से लेकर
हर छोटे-बड़े गुंडे तक,
उसका नाम इज़्ज़त और डर—दोनों से लेता था।
विक्रांत सुबह जल्दी नहीं उठता था,
लेकिन जब उठता,
तो पूरा शहर जैसे अलर्ट मोड में आ जाता।
काले बूट, सफ़ेद शर्ट,
गले में हल्की-सी चेन
और आंखों पर चश्मा—
उसका स्टाइल सादा था,
लेकिन टशन भारी।
उसके गैराज में खड़ी काली बुलेट
सिर्फ बाइक नहीं थी,
शहर के लिए एक इशारा थी—
“शेर जाग चुका है।”
मीरा।
सादा सूट,
खुले बाल,
और आंखों में वो सच्चाई
जो बहुत कम लोगों में होती है।
मीरा शहर के उस हिस्से से आती थी
जहाँ विक्रांत का नाम
अक्सर डर बनकर लिया जाता था।
लेकिन मीरा के लिए
वो सिर्फ एक अफ़वाह था।
मीरा को नहीं पता था
कि वही आदमी
जो शहर को अपने इशारों पर नचाता है,
उसकी ज़िंदगी में
बहुत जल्द
तूफ़ान और सुकून—