जज़्बातों का दर्द
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जज़्बातों का दर्द
कविता
कविता सीरीज
कागज़ खामोश था कलम मजबूर थी..... जज़्बात रूठे हुए थे क्योंकि लफ्जों के लिए जगह नहीं थी । कुछ दाग लगे थे कागज पर स्याही कहां बिखरे जलते कागज पर कलम ना कह पाई अपनी बात फिर राख हो गए लफ्जों के जज़्बात ✍️✍️ @writer_hyati25
लेखक : Writer_hyati25
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