ज़मीर का सुकून

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ज़मीर का सुकून


ख़्वाबों के पीछे भागते-भागते पता नहीं कितनी रातें सोई नहीं, और लोग बस इतना कहते हैं देखो, इसे सिर्फ इश्क़ का ही ख़ुमार है...... अमीरों की क़िस्मत में अलग-अलग रोग लिखे होते हैं, हमारे हिस्से तो मुफ़लिसी का ही बुख़ार है........ दुनिया तो अधीन है माया-रूपी चकाचौंध के, सही और ग़लत दोनों राहों पर निकल पड़े लोग आख़िर किसका किसको इंतज़ार है...... जो भीड़ में भी अपनी ज़मीर न बेचे कभी, असल में वही इंसान सबसे ईमानदार है...... लफ़्ज़ों से लड़ना छोड़ दिया हमने अब, सोच का गहरा सुकून ही आख़िरी हथियार है......
लेखक : Anu

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