ख़्वाबों के पीछे भागते-भागते पता नहीं कितनी रातें सोई नहीं,
और लोग बस इतना कहते हैं देखो, इसे सिर्फ इश्क़ का ही ख़ुमार है......
अमीरों की क़िस्मत में अलग-अलग रोग लिखे होते हैं,
हमारे हिस्से तो मुफ़लिसी का ही बुख़ार है........
दुनिया तो अधीन है माया-रूपी चकाचौंध के,
सही और ग़लत दोनों राहों पर निकल पड़े लोग आख़िर किसका किसको इंतज़ार है......
जो भीड़ में भी अपनी ज़मीर न बेचे कभी,
असल में वही इंसान सबसे ईमानदार है......
लफ़्ज़ों से लड़ना छोड़ दिया हमने अब,
सोच का गहरा सुकून ही आख़िरी हथियार है......