“मैं वो नहीं जो फ़ाइलों में हूँ”
“मैं वो नहीं जो फ़ाइलों में हूँ”
वह लड़की मरी नहीं थी—
लेकिन सरकारी काग़ज़ों में उसकी साँसें बंद कर दी गई थीं।
एक मामूली-सा हस्ताक्षर, एक सरकारी मुहर,
और एक ज़िंदा इंसान समाज की नज़रों से गायब हो गया।
यह कहानी है उस स्त्री की
जो अदालत से नहीं,
काग़ज़ों से लड़ रही है।
जिसके पास नाम है, पर पहचान नहीं।
जिसके पास देह है, पर अस्तित्व नहीं।
जिसकी हर दहलीज़ पर यही कहा जाता है—
“रिकॉर्ड में तो आप मर चुकी हैं।”
यह उपन्यास पूछता है—
क्या इंसान काग़ज़ों से बड़ा होता है
या काग़ज़ इंसान से?
सरकारी दफ्तरों की अंधेरी गलियों,
समाज की मौन सहमति,
और एक स्त्री के भीतर चल रहे
अस्तित्व के विद्रोह की यह कथा
सिर्फ़ एक लड़की की कहानी नहीं—
यह उन सभी लोगों की आवाज़ है
जो ज़िंदा होकर भी गिने नहीं जाते।
“मैं वो नहीं जो फ़ाइलों में हूँ”
एक संवेदनशील, साहसी और झकझोर देने वाला उपन्यास है—