शादी का झूठा रिश्ता

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शादी का झूठा रिश्ता


सुबह का वक्त। शहर की सबसे ऊँची और आलीशान बिल्डिंगों में से एक। शीशे की दीवारों वाला आलीशान ऑफ़िस। राठौड़ कॉरपोरेशन। जहाँ से पूरा शहर किसी नक़्शे की तरह नज़र आ रहा था। महँगी पेंटिंग्स और मॉडर्न आर्ट से सजी दीवारों के बीच एक बेचैनी का आलम था। अमर सिंह राठौड़, जिसकी शख़्सियत में सूरज जैसी चमक थी। वो आज गुस्से में किसी तूफ़ान की तरह अपने ऑफ़िस में चहलक़दमी कर रहा था। उसके सामने उसका सबसे अज़ीज़ दोस्त और वकील, कबीर, सोफ़े पर बैठा था। अमर लगभग चीखते हुए कबीर से कहता हैं, "नहीं — मतलब नहीं। मैं यह शादी नहीं करूंगा कबीर। मेरी शादी मेरी मरजी और मेरी पसंद से होनी चाहिए। मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला कोई और कैसे कर सकता है?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। एक पल को उसकी आँखों के सामने नैना की मुस्कुराती हुई तस्वीर घूम गई। वह मासूम चेहरा, वह हंसी, जिसकी वजह से अमर की दुनिया रोशन थी। कबीर, जो पेशे से एक वकील हैं और अमर का बचपन का दोस्त। वह अपने आप को शांत रखने की कोशिश कर रहा है। कुछ देर खामोश रहने के बाद वो सोफा से खड़ा हो कर अमर की ओर बढ़ता है। वो अमर के कंधे पर हाथ रखकर अमर को शांत करने का प्रयास करता हैं। "अमर, प्लीज़ समझने की कोशिश कर यार। यह सिर्फ़ एक वचन नहीं, बल्कि राठौड़ ख़ानदान की इज़्ज़त का सवाल है।" अमर एक कड़वी हँसी हंसते हुए कहता हैं, "इज़्ज़त? मेरी ज़िंदगी बरबाद करने को तू इज्जत कहता हैं? तू मेरा दोस्त हैं या दुश्मन? तुझे पता भी है, तू क्या कह रहा है? तू अच्छी तरह से जानता है की मैं नैना से प्यार करता हूं। मेरी जिंदगी हैं वो। मेरी सांसे हैं वो।” कहते हुए अपने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लेता है। फिर आगे कहता हैं, “और तू मुझे उस लड़की से शादी करने कह रहा है, जिस लड़की का मैने चेहरा तक नहीं देखा।” यह कहते हुए अमर फिर से बिफर जाता हैं और टेबल पर रखा क्रिस्टल का शो पीस उठाकर ज़मीन पर पटक देता हैं। शो पीस जमीन पर गिरकर टूट जाता है और काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर जाते है। अमर को लगता हैं जैसे उसका दिल टूट कर बिखर गया हो। वहीं दूसरी तरफ, शहर के एक पुराने और शांत इलाक़े में एक घर में शादी की तैयारियां चल रही थी। लेकिन सब के चेहरों पर थकान के साथ साथ उदासी का माहौल था। उसी घर के एक कमरे में दुल्हन के लिबास में सजी नव्या आइने के सामने उदास चेहरे के साथ बैठी थी। उसकी आँखें नम थी। चेहरे से रौनक गायब थी। वो बुझे मन से अपने आप से कहती हैं, “क्या सोचा था और क्या हो गया? सोचा था ग्रेजुएशन कंप्लीट करके अमेरिका या कनाडा जा कर अपना करियर बनाऊंगी। और शादी ….?” यह खयाल उसके जेहन में आते ही वो कांप गई। “मेरी सारी आजादी खत्म हो जाएगी। एक ऐसे इंसान के साथ रहना होगा, जिसको मैं जानती तक नहीं।” तभी कमरे में किसी के कदमों की आहट सुनाई दी। नव्या ने झट से अपनी आँखें पोछी और अपनी गर्दन पीछे घुमाई। उसने देखा, उसके पिता, अभय सिंह कमरे में आ रहे थे। उनकी आँखों में अपनी बेटी के लिए प्यार भी था और एक गहरी मजबूरी भी। वो नव्या के पास आते हुए बोले, “बहुत खूबसूरत लग रही हो बेटा।” नव्या बिना कुछ कहे सिर्फ उन्हें देखती रही। अभय सिंह उसके पास आए और उसके पास बैठ गए, फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, “मैं जानता हूं, तुम्हारे साथ ज्यादती हो रही हैं। लेकिन बेटा, मैं अपने दिए हुए वचन के आगे मजबूर हूं। बेटा, तुम्हारे दादा ने, अमर सिंह के दादा को इस शादी का वचन दिया था और तुम्हारे दादा मुझे यह जिम्मेदारी सौंप कर इस दुनिया से चल बसे। नव्या ने एक गहरी साँस ली। उसने महसूस किया, जैसे अपने सारे सपनों को इन सांसों में दफ़्न कर रही हो। उसने धीरे से सिर झुकाकर हामी भर दी। उसकी ख़ामोशी किसी चीख़ से ज़्यादा दर्दनाक थी। – – – वो दिन भी आ गया, जिस दिन अमर सिंह राठौड़ और नव्या की शादी होनी थी। एक बहुत ही विशाल मंडप। मेहमानों की चहल पहल। बिजनेस की दुनिया की बड़ी हस्तियां और विदेशी मेहमान, नव दंपत्ति को आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित हुए थे। मेहमानों का आना जारी था। मंडप को दियों और रोशनियों से सजाया गया था। आज अमरसिंह राठौड़ और नव्या की शादी थी। कुछ देर बाद पंडितजी ने वर और वधू को मंडप में बुलाने के लिए कहा। नव्या और अमरसिंह को मंडप में लाया गया। पंडित जी पवित्र मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे, लेकिन उन मंत्रों का असर दूल्हा दुल्हन तक नहीं पहुँच रहा था। अमर और नव्या पवित्र अग्नि के सामने बैठे थे, लेकिन फिर भी एक दूसरे से अनजान और अपने अपने खयालों में खोए हुए। अमर का चेहरा पत्थर की तरह सख़्त था। वह हर रस्म को जल्दी से निपटाने की फिराक में था। वो धीरे से पंडितजी के कान में कहता हैं, "पंडित जी, थोड़ा जल्दी कीजिए।" जब सात फेरे लेने की बारी आई तो नव्या किसी खड़ी हुई। उसकी नज़रें ज़मीन पर गड़ी थीं। हर फेरे के साथ उसे लग रहा था जैसे वह अपनी ज़िंदगी की क़ब्र पर मिट्टी डाल रही है। अमर ने उसकी तरफ एक नजर उठा कर भी नहीं देखा। बस सिर्फ शादी की रस्में पूरी की। शादी की रस्में पूरी होने के पश्चात सब लोग नव विवाहित दंपत्ति को बधाइयां देने लगे। कुछ लोग अमरसिंह की दादी कौशल्या देवी के पास जा कर उन्हें बधाई देने लगे। शादी संपन्न हो चुकी थी। अब वक्त था बिदाई का। नव्या अपनी मां के गले लग कर सिसक पड़ी। तभी उसके पिता अभयसिंह उसके पास आए। पिता को देखकर वो भावुक हो गई और कसकर उनके गले लग कर फुट फूट कर रोने लगी। अभयसिंह कौशल्या देवी के पहुंच कर उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए, “मेरी बेटी आप को सौंप रहा हूं, अब उसकी सारी जिम्मेदारी आप की हैं, अगर उससे कोई नादानी हो जाए तो उसे माफ कर देना।” कौशल्या देवी ने अभय के आंसू पोछते हुए कहा, “अभय, मेरी परिवार में कोई बेटी नहीं है, इसलिए मैं नव्या को अपनी बेटी बना कर ले जा रही हूं। आप निश्चिंत रहिए। उसे कोई तकलीफ नहीं होगी और एक बेटी की तरह ही प्यार करूंगी।" – – – नव्या अपनी नई, अनचाही मंज़िल, “राठौड़ मेंशन” की ओर जा रही थी। क़ीमती कार की पिछली सीट पर वह एक कोने में सिमटी बैठी थी और अमर दूसरे कोने में। बाहर शहर की रौनक़ थी, लेकिन अंदर एक गहरी ख़ामोशी। तभी अमर ने अपना फ़ोन निकाला। फ़ोन की स्क्रीन की तेज़ रौशनी उसके सख़्त चेहरे पर पड़ी। उसकी उँगलियाँ तेज़ी से स्क्रीन पर कुछ टाइप करने लगीं। नव्या ने डरते हुए उसकी तरफ़ देखा। वह मैसेज तो नहीं पढ़ पाई, लेकिन अमर के चेहरे पर जो सुकून था, वह उससे छिप नहीं सका। अमर ने वह मैसेज दिया, "इंतज़ार करो मेरी जान। यह रिश्ता सिर्फ़ 7 दिनों का है।" फिर मुस्कुराते हुए मोबाइल अपनी जेब में रख दिया। क्या यह इस रिश्ते का सच? क्या कौशल्या देवी, अभय को दिया हुआ अपना वचन निभा पाएगी? जानने के लिए पढ़ते रहिए “शादी का झूठा रिश्ता” सिर्फ "लफ्जों की कहानी" पर।
: Lovely jo

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