“जानिए महाभारत के वीर अर्जुन की गाथा, उन्हीं के मुख से...”
कैसे बीता उनका बचपन, जब वह केवल पाँच भाइयों में नहीं बल्कि “धर्म” और “कर्म” के बीच झूलता एक हृदय था कैसे सीखी उन्होंने शिक्षा — गुरु द्रोण के सान्निध्य में जहाँ लक्ष्य था केवल मछली की आँख, पर दृष्टि में था समर्पण का संसार कैसे लड़े उन्होंने युद्ध अपनों के विरुद्ध,
जब सामने खड़े थे अपने ही गुरू, मित्र, भाई —
और भीतर जल रहा था एक द्वंद्व — “क्या यह धर्म है या अधर्म?” उस युद्धभूमि में जब हर ओर मृत्यु का नृत्य था,तब श्रीकृष्ण से मिला उन्हें वह अथाह ज्ञान जो बना — गीता का सार, और उनके जीवन का प्रकाश यह केवल अर्जुन की कहानी नहीं,
यह हर उस आत्मा की आवाज़ है —
जो कभी सही और अपने के बीच फँसकर भी,
धर्म का मार्ग चुनती है।
जानने के लिए पढ़िए" मैं अर्जुन हूं "....