दीवानगी
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दीवानगी
प्यार
कविता
वो पागलपन की हद जिसे छूना गुनाह था, अब हर टूटती उम्मीद में बस उसी की आह थी। दर-ओ-दीवार अब मुझसे लिपटकर रोते हैं, ये इश्क़ नहीं, मेरी तबाहियों की चाह थी।
: Simple Human
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