लोकतंत्र का मेला
हर पाँच साल बाद आता है,
यह चुनाव का कैसा मेला।
सजती है चौपाल, गली-गली,
हर नेता यहाँ अकेला।
वोट की खातिर हाथ जोड़ता,
सेवक नहीं, जैसे कोई चेला।
सच्चे-झूठे वादों की वो,
गंगा-जमुना बहाते हैं।
कल तक जो मुँह फेरते थे,
आज गले लगाते हैं।
बिजली-पानी, सड़क-शिक्षा,
सपनों के महल बनाते हैं।
हर समस्या का हल है उनके पास,
जनता को यही बताते हैं।
भीड़ इकट्ठी करने को,
रंग-बिरंगे तरीका अपनाएंगे।
गरीब की कतारों में भी,
भेंट-सौगातें पहुँचाएंगे।
किसी को कंबल, किसी को राशन,
किसी को मदहोश बिठाएंगे।
ईमान के मोलभाव में वो,
वोट खरीद ले जायेंगे।
जनता का अमूल्य मत,
चंद रुपयों में बिक जाएगा।
चुनाव जीतकर यही 'सेवक',
फिर राक्षस बन जाएगा।
सत्ता का सुख भोगकर वो,
बहकी-बहकी बातें करके।
अपने स्वार्थ की पूर्ति को,
पूरे गांव को लूट खायेगा।
और गाँव बस उम्मीद लगाए,
अगले पाँच साल तक सो जाएगा।
यही कहानी, यही चक्र,
हर चुनाव में दोहराएगा।
रश्मि मीना
जयपुर, राजस्थान