हम अब भी खुद को समझा रहे है
हम खामोशियों में भी उनके नाम को छुपा रहे हैं,
जानते हैं वो ग़ैर हैं, फिर भी हक़ जता रहे हैं।
हर रात नींद से पहले खुद को समझाते हैं,
मगर बेवजह ख्वाबों में खुद को सता रहे हैं।
चल पड़े हैं नई राहों पर बिना किसी सहारे,
दिल की पाबंदियों को अब खुद से हटा रहे हैं।
लिखना खुशी चाहते है लेकिन दर्द उभरता है,
क्यों बार बार अपनी ही किस्मत को मिटा रहे हैं।
दिल कह रहा है लौट जा, पर अकल मना रही है,
वो लम्हे भूलने की कोशिश में सब कुछ लुटा रहे हैं।
अलग होकर उनसे अब हौसला बना रहे हैं,
टूटी हुई उम्मीदों को फिर से जुटा रहे हैं।
शहर, चेहरा, खुशबू सबसे दूरी बढ़ा रहे हैं,
उनसे दूर रहकर उनकी परेशानी घटा रहे हैं।
कहते हैं “यही ठीक है”, खुद को ये सिखा रहे हैं,
यही होता है हमेशा और आखिर में हुआ भी यही खुद को रटा रहे हैं।
🍂🍂🍂