बदलते लोग
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बदलते लोग
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
मुस्कान में छिपे होते हैं अब सवाल बहुत, चेहरों के पीछे अब मिलते हैं जाल बहुत। रिश्तों की किताब में अब स्याही कम है, मतलब का हर पन्ना भारी ग़म है।
लेखक : rani
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