झूठी दुनिया
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झूठी दुनिया
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह दुनिया एक मृगतृष्णा जैसी ,लालच दे रही है मुझे अपने से मिलने की। यहां कोई राह में नहीं है अपने, कैसे कहूं यह दुनिया दिखाती है ना पूरे होने वाले सपने..
: Jyoti kumari
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