झूठ
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झूठ
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह कविता झूठ के उन चेहरों को उजागर करती है जो मुस्कान के पीछे छिपे होते हैं, जहाँ सच की आवाज़ भी अब झूठ में गुम हो चुकी है।
लेखक : विजय सांगा
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