मैं धूप-छांव की परछाई हूं।

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मैं धूप-छांव की परछाई हूं।


यह कविता 'स्त्री की आत्मा' और उसके 'मौन संघर्ष' के भावों में डूबी हुई है। इसे पढ़ने के बाद अपनी उत्साहवर्धक समीक्षा जरूर दीजियेगा।

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