मैं धूप-छांव की परछाई हूं।
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मैं धूप-छांव की परछाई हूं।
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह कविता 'स्त्री की आत्मा' और उसके 'मौन संघर्ष' के भावों में डूबी हुई है। इसे पढ़ने के बाद अपनी उत्साहवर्धक समीक्षा जरूर दीजियेगा।
लेखक : Geet ka safar ✍️
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