🌑 परछाई 🌑
धूप के संग चलती आई,
संग मेरे हर मोड़ पे छाई।
कभी लंबी, कभी छोटी सी,
पर मेरी सच्ची साथी थी वही।
जब भी अंधेरा आया जीवन में,
वो चुपचाप कहीं गुम हो गई,
पर जैसे ही किरणें लौटीं,
फिर से मेरे संग जुड़ गई।
न कुछ मांगा, न कुछ कहा,
बस मेरे संग चलती रही,
हर सुख-दुख में चुपचाप सी,
मेरी चुप्पी भी वो समझती रही।
कभी ज़मीन पर फैली यादों सी,
कभी दीवार पे तस्वीर बनी,
कभी जल में लहराती छवि,
कभी अंधेरों में खोती घनी।
परछाई से सीखा मैंने,
साथ निभाना बिन बोले भी,
वो बताती है — सच्चा रिश्ता,
शब्दों का नहीं, एहसासों का होता है कभी।
श्वेता अग्रवाल ❤️🔥✍️✍️