चारों तरफ घना अंधेरा था… बस सन्नाटा… और दूर से आती एक धीमी-धीमी सरसराहट। राज ने खुद को एक वीरान जगह पर खड़ा पाया। हवा में अजीब सी ठंडक थी, लेकिन उसके माथे पर पसीना था। उसे महसूस हो रहा था कि वो अकेला नहीं है।
"क…कौन है वहाँ?"
उसकी आवाज़ काँप रही थी। सामने सिर्फ कोहरा था, जो धीरे-धीरे घना होता जा रहा था। उसने हिम्मत करके आगे कदम बढ़ाया, और तभी—
"राज..."
एक धीमी, हल्की-सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी। वह आवाज़ जानी-पहचानी थी… लेकिन यह आवाज़ इस दुनिया की नहीं लग रही थी।
"राज... तुम मुझे भूल गए?"
कोहरे के बीच से एक परछाई उभरी एक लड़की की, जो सफेद कपड़ों में थी। उसके लम्बे बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसकी आँखें… वो आँखें इतनी गहरी थीं कि राज को लगा, जैसे वो उसमें समा जाएगा।
राज के होंठ काँपने लगे। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। उसने लड़की का चेहरा पहचानने की कोशिश की, लेकिन तभी…
झटाक! परछाई की आँखें अचानक खून जैसी लाल हो गईं, और उसने राज की ओर हाथ बढ़ाया।
"राज, तुम सिर्फ मेरे हो!"
राज ज़ोर से चीख पड़ा और उसका बदन पसीने में भीग गया।
"राज! बेटा उठो!"
उसकी माँ, शांति देवी, उसे ज़ोर-ज़ोर से हिला रही थीं। राज की साँस तेज़ हो रही थी, और उसके हाथ काँप रहे थे।
"माँ… वो… वो फिर से आई थी!" उसने हाँफते हुए कहा।
शांति देवी ने उसे सीने से लगा लिया और उसके बालों पर हाथ फेरा। "बेटा, बस एक बुरा सपना था… घबराओ मत।"
लेकिन राज जानता था, यह सिर्फ सपना नहीं था। कुछ था… कुछ ऐसा जो हकीकत से जुड़ा हुआ था।
सुबह जब राज के पिता, विक्रम मल्होत्रा, घर आए, तो शांति देवी ने तुरंत उन्हें सब कुछ बता दिया।
"विक्रम, ये बच्चा हर रात बुरे सपने देखता है… डर के मारे कांपता रहता है! हमें कुछ करना होगा!"
विक्रम मल्होत्रा सोच में पड़ गए। "मुझे लगता है कि इसे कुछ दिनों के लिए यहाँ से दूर भेज देना चाहिए। अगर ये माहौल बदलेगा, तो शायद इसके सपने भी बंद हो जाएंगे।"
"तुम्हें लंदन जाना होगा, राज!"
राज ने अपनी माँ की तरफ देखा। "पर पापा, मुझे यहाँ से जाने की जरूरत क्यों है? मैं ठीक हूँ!"
"नहीं, बेटा… ये जगह अब तुम्हारे लिए सही नहीं है। मैं चाहता हूँ कि तुम लंदन जाओ, पढ़ाई करो और वहाँ एक नई ज़िंदगी शुरू करो।"
राज कुछ कहना चाहता था, लेकिन उसके पिता का फ़ैसला अटल था।
जब राज अपने पिता के साथ एयरपोर्ट जाने के लिए कार में बैठा, तो अचानक रास्ते में कुछ लोग खड़े हो गए।
"गाड़ी रोको!"
राज ने जैसे ही बाहर देखा, उसका दिल धड़क उठा। सामने नैना का परिवार खड़ा था उसका पिता बलदेव राजपूत और उसका भाई सुखदेव।
"तुम हमें बिना जवाब दिए नहीं जा सकते, राज!" बलदेव राजपूत की आवाज़ में गुस्सा था।
सुखदेव गुस्से से राज की तरफ बढ़ा और उसकी कॉलर पकड़ ली। "मेरी बहन तुमसे प्यार करती थी, और आज वो इस दुनिया में नहीं है! आख़िर क्या हुआ था उस रात?"
राज के दिमाग में अजीब-अजीब तस्वीरें चमकने लगीं। खून… एक चीख… अंधेरा… और नैना का चेहरा।
"मुझे कुछ याद नहीं!" उसने हड़बड़ाते हुए कहा।
बलदेव राजपूत ने गहरी नज़र से उसकी ओर देखा और एक लंबी सांस भरी। "अगर कुछ याद आ जाए… तो लौटकर आना, वरना हमारी बेटी की आत्मा कभी चैन नहीं पाएगी।"
राज की नज़रें झुक गईं। उसने कुछ नहीं कहा और गाड़ी में बैठ गया।
फ्लाइट टेकऑफ कर चुकी थी। राज खिड़की के बाहर देख रहा था।
जैसे ही प्लेन बादलों के बीच पहुंचा, उसे अचानक अपनी खिड़की के बाहर कुछ दिखा सफेद कपड़ों में एक लड़की… जो हवा में तैर रही थी… और उसकी तरफ देख रही थी।
"नैना…?"
लेकिन जैसे ही उसने दोबारा देखा, वहाँ कुछ नहीं था।
राज ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वो जानता था कि ये कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी…
कहानी जारी रहेगी....!
®Dinesh Divakar❤️🩹
तो अब बताइए कैसी लगी आपको यह कहानी 😇 उम्मीद है अच्छी ही लगी होगी। कमेंट करके जरूर बताइएगा, तो चलिए अगले भाग की ओर बढ़ते हैं।