बेघर की रातें

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बेघर की रातें


सर्द रातें सिर्फ़ मौसम की मार नहीं होतीं, वे उन बेघरों की वीरानी भी समेटे चलती हैं जो छत और अपनापन दोनों से महरूम हो जाते हैं। फुटपाथ पर सोता हर इंसान हमें आईना दिखाता है कि सभ्यता और तरक्की के शोर में भी इंसानियत की गर्माहट कितनी ठंडी पड़ चुकी है। यह कहानी उसी टीस को शब्दों में पिरोने का प्रयास है।।

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