जब आंखों पर पट्टियां बांध दी जाती हैं, होंठों पर ताले जड़ दिए जाते हैं और हाथ बेड़ियों में जकड़ दिए जाते हैं, तब उसकी ज़िन्दगी खामोशी में कैद हो जाती है। यह खामोशी सिर्फ चुप्पी नहीं होती, यह दर्द, विद्रोह और सहनशीलता का ऐसा सागर है जिसमें अनगिनत अनकही कहानियां डूबी होती हैं। यह कविता उसी मौन की दास्तान है, जहां आवाज़ें दबाई जाती हैं, लेकिन सन्नाटे भी चीख बन जाते हैं।