🌊 सूखती नदियाँ 🌊
सूखती नदियाँ, बंजर होते किनारे,
धरती की प्यास में छिपे हैं इशारे।
कभी लहरों का संगीत सुनाती थीं,
आज वीरानी का गीत सुनाती हैं।
बालू पर ठहरी है टूटी सी धड़कन,
प्यासे हैं खेत, सूखे हैं हर वन।
मछलियों की दुनिया बिखर सी गई,
जीवन की लहर अब ठहर सी गई।
पेड़ों की जड़ें तरसती नमी को,
आकाश पुकारे धरती की जमी को।
बूँद-बूँद को तड़पते हैं गाँव,
सूखते नदियों का सुनसान चाव।
कभी जिनमें बच्चों की किलकारियाँ गूँजतीं,
अब उनमें सन्नाटे की परछाइयाँ घूमतीं।
नावों के सपने अब खो गए हैं,
पानी के गीत भी सो गए हैं।
धरती की गोद खाली न हो जाए,
मानव का लोभ इसे और न सुखाए।
संभालो नदियों को, ये जीवन की डोर हैं,
इन्हीं से धरती के सपनों की भोर है।
पानी बचेगा तो जीवन खिलेगा,
नदी बहेगी तो सब कुछ मिलेगा।
श्वेता अग्रवाल