कितनी अजीब है यह दुनिया की रीत,
जहाँ औरत का वजूद बस रिश्तों में बँट कर रह जाता है।
कभी माँ, कभी बहू, कभी पत्नी कहलाई,
मगर कभी सिर्फ औरत होकर जी नहीं पाती है।
वो अपने हिस्से की छाँव दूसरों को दे देती है,
ख़ुद धूप में खड़ी होकर भी सबको सुकून देती है।
सपनों की गठरी को कोने में रख देती है,
बस ज़िम्मेदारियों की गठरी उठाए रहती है।
कभी देवी कहकर पूजी जाती है,
तो कभी दासी सा बोझ ढोती है।
बराबरी की बातें जब जब उठती हैं,
उन्हें उनकी हदें याद दिलाई जाती हैं।
पर यह हदें किसने बनाई हैं?
यह क़ैद किसने सजाई है?
और कब तक औरत अपने ही वजूद को खोकर
दूसरों के लिए जीती रहेगी…?
शायद उस दिन तक,
जब वो अपने ही आईने में झाँककर कहेगी,
मैं सिर्फ़ रिश्तों का नाम नहीं,
मैं भी एक पूरा जहान हूँ।
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