शहर की एक सामान्य सुबह थी। अदालत परिसर के बाहर जीवन अपनी लय में भागता दिखाई दे रहा था। ऑटो के हॉर्न, कागज़ों की फड़फड़ाहट, और वकीलों के कोटों की सरसराहट में जैसे पूरा वातावरण किसी महान नाटक का मंचन करता हो। इन सबके बीच वकील राघवेंद्र शर्मा बहुत शांत खड़े थे। उनकी आँखों में गहराई थी, जैसे भीतर कोई पुराना तूफ़ान छिपा हुआ हो।