मिट्टी का घर जब बस जाता,
मन का आंगन महक उठ जाता।
दीवारें भले हो टोकरियों जैसी,
पर अपनापन उनमें रच-बस जाता।
छप्पर टपकता बरसातों में,
फिर भी सुकून दिलाता हर रातों में।धूप छने जब तिनकों से भीतर,
सपनों का दीप जलाता मन संगीतर।
न दरवाज़ों पर ताले भारी,
न दीवारों पर दूरी की सवारी।