🌺 माँ शैलपुत्री 🌺

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🌺 माँ शैलपुत्री 🌺


नवरात्रि की पावन बेला में पहले दिन माँ शैलपुत्री की आराधना की जाती है। "शैल" का अर्थ है पर्वत और "पुत्री" का अर्थ है बेटी, इस प्रकार माँ शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री कही जाती हैं। वे देवी दुर्गा का प्रथम स्वरूप मानी जाती हैं और इन्हें शक्ति साधना का आधार माना गया है। माँ शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और शांतिमय है। वे वृषभ (बैल) पर सवार होती हैं, दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं और बाएँ हाथ में कमल। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र का अलंकार उन्हें और भी अद्भुत बनाता है। पहले दिन की पूजा में कलश स्थापना और गणेश पूजन के बाद माँ शैलपुत्री का ध्यान किया जाता है। भक्तजन दूध से बनी वस्तुओं का भोग लगाते हैं और सफेद वस्त्र धारण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। ऐसा माना जाता है कि माँ शैलपुत्री की आराधना से साधक के जीवन में स्थिरता, धैर्य और मानसिक संतुलन आता है। आध्यात्मिक दृष्टि से माँ शैलपुत्री पर्वत के समान दृढ़ता और अडिग विश्वास की प्रतीक हैं। वे हमें यह संदेश देती हैं कि कठिनाइयों के बीच भी यदि धैर्य और शक्ति बनी रहे, तो साधक जीवन की हर ऊँचाई को पा सकता है। शक्ति का प्रथम स्वरूप है माँ शैलपुत्री, भक्ति से भर देतीं जीवन की झोली। त्रिशूल-कमल से सुसज्जित जो रूप, भक्तों के हर संकट का करतीं सर्वनाश स्वरूप। इस प्रकार नवरात्रि का पहला दिन साधना, श्रद्धा और शक्ति की नींव रखने का दिन है। माँ शैलपुत्री के आशीर्वाद से ही भक्त अपनी साधना यात्रा का प्रारंभ करते है। ✨🙏 जय माँ शैलपुत्री 🙏✨
लेखक : Anu

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