फटे हुए कपड़ों में लिपटी मजबूरी,
आँखों में सपनों की टूटी दूरी।
खाली बर्तन का दर्द सुनाई देता,
रोटी का सपना भी पराया लगता।
धूप में तपती नन्हीं हथेलियाँ,
ढूँढती हैं टुकड़ा किसी छत की छाँवियाँ।
भूख से बिलखते मासूम चेहरे,
जीवन की राहों में बस ठहरे।
सड़क किनारे बैठा वो बच्चा,
खिलौनों की जगह ढूँढे कचरा।
गरीबी की आँधी सब लूट ले जाती,
उम्मीदों की लौ भी बुझा जाती।
रातें गुज़रती हैं बिना चूल्हा जले,
आँखें तरसती हैं अनाज के दाने मिले।
सपनों के महल बस धुँधले पड़ते,
हकीकत में तो आँसू ही बढ़ते।
धनवान की थाली झिलमिलाती,
गरीब की थाली सूनी रह जाती।
नंगे पाँव ठोकरें खाते,
ख्वाहिशें रास्तों में मर जाते।
कब तक ये भूख सताती रहेगी?
कब तक ये गरीबी रुलाती रहेगी?
किसी दिन इंसानियत जागेगी,
हर पेट को रोटी मिल जाएगी।
तभी मिटेगा ये दुख का अंधेरा,
फिर हर चेहरा होगा सवेरा।
श्वेता अग्रवाल 👈✍️✍️