वो लम्हें
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वो लम्हें
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
लम्हें ही तो ज़िन्दगी का असली चेहरा हैं—कभी मुस्कान बनकर खिलते हैं, तो कभी दर्द बनकर यादों की गहराई में उतर जाते हैं।
: विजय सांगा
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