स्वैछिक

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स्वैछिक


यह कहानी एक छोटे से कस्बे की है, जहाँ एक साधारण लड़की संध्या अपने जीवन के मायनों को तलाश रही होती है। पढ़ाई और रोज़मर्रा की दौड़-भाग में उसे महसूस होता है कि सच्ची खुशी दूसरों की मदद करने में है। संध्या अपनी नौकरी और आराम को छोड़कर गाँव-गाँव जाकर बच्चों को पढ़ाती है, बीमारों की सेवा करती है और लोगों को स्वावलंबी बनने के लिए प्रेरित करती है। इस सफर में उसे संघर्ष, आलोचना, आर्थिक तंगी और समाज की उपेक्षा झेलनी पड़ती है, लेकिन अंततः उसकी स्वैच्छिक सेवा ही लोगों के जीवन को बदल देती है।

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