कांच जैसी दोस्ती
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कांच जैसी दोस्ती
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
काँच जैसी दोस्ती नाज़ुक भी है और पारदर्शी भी, ये टूटे तो चुभन देती है, निभे तो ज़िंदगी चमका देती है।
: विजय सांगा
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