नदी की पुकार

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नदी की पुकार


नदी की पुकार कविता है , पुकार है पानी की एक एक बूंद की जो हमें जीवन देती है , जो हमारी प्यास बुझाती है , भूख लगने पर खाया जाने वाला खाना भी हम तभी खाते है , जब खेतों में नदी , नहरों से सिंचाई होती है , बारिश भी तभी होती है जब हम पेड़ लगाते है, हम लोगो ने तो आस्था को भी आज व्यापार बना दिया है , और पावन नदी के घाटों को भी हम दोषित के रहे है ,जिससे हमारे पापों का तो पता नही लेकिन प्रदूषण से जरूर हमारी सांसों में जहर घुल रहा है। यह पुकार एक नदी की , जो आज इतनी बेबस हो गई है कि हम इंसानों से हमारे ही जीवन के लिए बोल रही है मुझे मां मात मानो सिर्फ एक नदी मान लो जो तुम्हे पानी देती है ,और वो पानी तुम्हे शुद्ध रखना है क्योंकि तुम्हे उस पानी की जरूरत है !
: Charu

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