रीना अब अठारह बरस की हो चुकी थी। लोग कहते थे कि उसकी आँखों में परिपक्वता उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा थी। पर यह परिपक्वता उसे मिली थी—मासूमियत खोकर, खेल-खिलौने छोड़कर, और जल्दी बड़े हो जाने की मजबूरी से।
रीना का बचपन बहुत प्यारा था। बारिश आते ही वह छत पर नाच उठती, मिट्टी से महल बनाती और स्कूल से लौटते ही दोस्तों के साथ रस्सी कूद खेलती। उसकी हंसी इतनी साफ थी कि सुनने वाले भी मुस्कुराने लगते।
उसे अब भी याद है, कैसे गर्मियों की छुट्टियों में वह और उसके दोस्त आम के पेड़ पर चढ़ जाते। कौन सबसे बड़ा आम तोड़ेगा, इस बात पर झगड़ा होता और फिर सब मिलकर पेड़ के नीचे बैठकर उन आमों को नमक-मिर्च के साथ खाते।
बरसात के दिनों में उसकी सबसे बड़ी खुशी थी—कागज़ की नाव। वो और उसका भाई छोटी सी नाली में नाव बहाते और देखते कि किसकी नाव सबसे दूर तक जाएगी। अगर उसकी नाव बीच में अटक जाती, तो वह ज़ोर से हंसते हुए उसे छेड़ता—
"देखो रीना, तुम्हारी नाव को भी तैरना नहीं आता!"
कभी पड़ोस की लड़कियों के साथ गुड्डा-गुड़िया की शादी रचती। साड़ी माँ की अलमारी से चुपके से निकालती और गुड़िया पर लपेट देती। जब माँ पकड़ लेतीं, तो वह शर्माते हुए भाग जाती। और फिर सब मिलकर हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते।
लेकिन ज़िंदगी हमेशा एक सी नहीं रहती। एक दिन अचानक उसके पिता चल बसे। घर का सहारा छिन गया। माँ ने जितना हो सकता था उतना संभाला, मगर अकेले के बस की बात नहीं थी। ऐसे में रीना ने अपने बचपन की किताबें बंद कर दीं और सिलाई का काम सीखकर माँ का हाथ बंटाने लगी।
अब उसकी सुबह खेल के मैदान में नहीं, बल्कि कपड़े काटने और धागे समेटने में गुजरती। उसके नर्म हाथ, जो कभी गुड़िया–गुड्डे सजाते थे, अब सुई की चुभन से भर जाते। दोस्तों की चहक उसकी खिड़की तक आती, मगर वह खुद कमरे में बैठकर काम पूरा करने में जुटी रहती।
कभी–कभी वह चुपके से बाहर बच्चों को पतंग उड़ाते देखती। पतंगें जब आसमान में ऊँचाई तक चली जातीं, तो उसकी आँखें उन्हें नहीं, अपना बचपन ढूँढ़तीं। उसे लगता—उसका बचपन भी ऐसे ही हाथ से छूट गया है, जैसे कोई पतंग डोर कटकर हवा में कहीं खो जाती है।
उसके भाई–बहन अब स्कूल जाते हैं। उनकी किताबें देखकर रीना मुस्कुरा देती है, पर अंदर ही अंदर सोचती है—काश! वह भी पढ़ाई जारी रख पाती। काश! उसे भी उम्र से पहले बड़े होने की जिम्मेदारी न उठानी पड़ती।
आज रीना मोहल्ले की ‘बड़ी दीदी’ बन चुकी थी। सब उसकी मेहनत की तारीफ करते। भाई–बहनों के लिए वह माँ जैसी थी और माँ के लिए सबसे बड़ी ताक़त। लेकिन जब रात को सब सो जाते, तो वह खिड़की पर बैठकर चुपचाप आसमान को देखती। उसकी आँखों से आंसू बहते और वह बुदबुदाती—
"मेरा बचपन… कहाँ चला गया?"
पर उसे पता था कि बचपन कभी लौटकर नहीं आता।
बस यादों की गलियों में ही उसकी मासूम हंसी अब भी छुपी है।
पर उसी वक्त बगल के कमरे से उसके छोटे भाई–बहनों की खिलखिलाहट सुनाई दी। वे पढ़ाई करते-करते अचानक कोई मज़ेदार किस्सा सुनाने लगे थे। उनकी मासूम हंसी कमरे की दीवारों को जैसे रोशन कर रही थी।
रीना उठी, उनके पास गई और चुपचाप बैठ गई। छोटे भाई ने झट उसके हाथ पकड़ लिए और बोला—
"दीदी, कल बारिश आए तो हम कागज़ की नाव बनाएँगे, तुम भी बनाना।"
रीना मुस्कुराई। उस मुस्कान में वही चमक थी, जो बरसों पहले बारिश की बूंदों में नाचते वक्त उसके चेहरे पर होती थी।
उसने मन ही मन सोचा—
"शायद मेरा बचपन सचमुच खोया नहीं… बस बदल गया है। अब यह मेरे भाई–बहनों की हंसी, उनकी मासूमियत और उनके सपनों में जीता है।"
उस रात रीना की आँखों से आंसू ज़रूर गिरे, पर इस बार वो आंसू दर्द के नहीं, सुकून और उम्मीद के थे।
गुम हुआ बचपन… कभी लौटकर नहीं आता, लेकिन कभी–कभी अपनों की हंसी में फिर से मिल जाता है।
उस रात के बाद रीना के दिल में जैसे कोई छोटा सा दीपक जल उठा था। उसे लगा, उसके भाई–बहन ही उसकी सबसे बड़ी दौलत हैं। उनका साथ उसे फिर से जीने की वजह दे रहा था।
अगले ही दिन जब सचमुच बारिश हुई, तो भाई–बहनों ने उसे खींचकर बाहर बुला लिया। चारों तरफ़ पानी ही पानी था। सबने मिलकर कागज़ की नावें बनाईं। रीना की नाव जब सबसे आगे निकली, तो उसके छोटे भाई ने ताली बजाते हुए कहा—
“वाह दीदी! देखो, अब तुम्हारी नाव को तैरना आ गया।”
रीना हंसी और उसी पल उसे लगा जैसे बरसों से खोया बचपन उसकी हथेली में लौट आया हो।
धीरे–धीरे मोहल्ले की और लड़कियाँ भी उससे बातें करने लगीं। कोई उससे साड़ी पहनना सीखता, कोई उससे गुड्डा–गुड़िया के लिए कपड़े सिलवाता। रीना उन्हें देखकर सोचती—"शायद मेरा बचपन अब दूसरों के बचपन को सजाने के लिए ही लौटा है।"
एक दिन स्कूल से लौटकर उसकी छोटी बहन बोली—
“दीदी, हमारी मैडम कह रही थीं कि अगर कोई सिलाई का काम अच्छा जानता है तो वो स्कूल के लिए यूनिफॉर्म बना सकता है। तुम चलोगी क्या?”
रीना पहले तो चौंकी, फिर सोचकर मुस्कुरा दी। उसने हाँ कहा। अगले हफ्ते से वह स्कूल की छोटी–छोटी सिलाई करने लगी। वहाँ बच्चों के बीच रहकर उसे अपना अधूरा सपना पूरा होने जैसा महसूस हुआ।
शाम को जब बच्चे उसे पढ़ाई के बारे में पूछते, तो वह उन्हें अपनी जानकारी के अनुसार बताती। कई बार किताब लेकर खुद भी पढ़ने लगती। धीरे–धीरे उसे अहसास हुआ कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
उसकी माँ ने एक दिन गर्व से कहा—
“रीना, तूने हमारी ज़िंदगी को फिर से हंसी और उम्मीद से भर दिया है।”
रीना ने माँ का हाथ थामते हुए मन ही मन सोचा—
"बचपन खोया नहीं, बस ज़िम्मेदारियों की परतों में छुप गया था। अब मैं हर मुस्कान, हर सीख और हर छोटे सपने में उसे फिर से जीऊँगी।"
उस रात जब उसने आसमान की ओर देखा, तो उसे लगा—अब उसकी पतंग की डोर नहीं टूटी है। बल्कि वह मज़बूती से थामे हुए है, और आसमान में नए सपनों की ओर बढ़ रही है।
एक दिन स्कूल की मैडम ने उससे कहा—
“रीना, तुम्हारा हाथ बहुत अच्छा है। तुम्हें सिर्फ़ कपड़े सिलने तक ही क्यों रुकना चाहिए? तुम्हें फैशन डिज़ाइनिंग सीखनी चाहिए।”
पहले तो रीना झिझकी। लेकिन माँ और भाई–बहनों ने उसे इतना प्रोत्साहित किया कि उसने पास ही के सरकारी संस्थान में दाख़िला ले लिया। दिन में काम और शाम को पढ़ाई… यह सब आसान नहीं था, लेकिन रीना ने ठान लिया कि अब वह अपनी अधूरी राह पूरी करेगी।
धीरे–धीरे उसका हुनर सबकी नज़र में आने लगा। मोहल्ले की औरतें उससे अपने त्यौहार और शादी के कपड़े सिलवाने लगीं। वह छोटे–छोटे डिज़ाइन बनाने लगी, जिन्हें लोग बहुत पसंद करने लगे।
इसी बीच, रीना ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। रात को जब सब सो जाते, तो वह अपने छोटे भाई की किताबें खोलकर खुद पढ़ती। उसे लगता जैसे बचपन में जो सपना छूट गया था, अब वो फिर से ज़िंदा हो रहा है।
कुछ सालों में रीना ने सिलाई से इतना कमा लिया कि घर की हालत सुधर गई। भाई–बहन अच्छे कॉलेजों में पढ़ने लगे और माँ के चेहरे पर सालों बाद सुकून की मुस्कान लौट आई।
लेकिन सबसे बड़ा दिन तब आया जब रीना को अपने डिज़ाइन किए हुए कपड़ों की पहली प्रदर्शनी लगाने का मौका मिला। वहाँ लोग उसके बनाए परिधानों को देखकर दंग रह गए। कई लोगों ने उससे ऑर्डर भी दिया।
उस रात रीना जब थकी–हारी घर लौटी, तो माँ ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा—
“बेटी, तेरे पापा आज ज़िंदा होते तो सबसे ज़्यादा गर्व उन्हें ही होता।”
रीना की आँखें भर आईं। उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा—
“पापा, मेरा बचपन भले ही छूट गया, लेकिन उसी की राख से मैंने नए सपने गढ़ लिए हैं। अब ये सिर्फ़ मेरे नहीं, हमारे पूरे परिवार के सपने हैं।”
अब रीना केवल ‘मोहल्ले की बड़ी दीदी’ नहीं रही। वह एक बेटी, बहन, कलाकार और सपनों को सच करने वाली युवती बन चुकी थी।
और जब कभी बारिश होती, तो वह आज भी अपने भाई–बहनों के साथ कागज़ की नाव ज़रूर बनाती—क्योंकि उसे याद था कि यही छोटी–छोटी बातें उसे ताक़त देती हैं।