“नदी की पुकार” एक ऐसी गीतात्मक कविता है जिसमें नदी स्वयं मानो जीवंत हो उठती है।
यह कविता नदी की वेदना, उसका महत्व और मानव से उसकी विनती को सुर और ताल में बाँधकर प्रस्तुत करती है।
हर अंतरा नदी के बहते प्रवाह जैसा लगता है—कभी कोमल, कभी तीव्र—पर हमेशा जीवनदायिनी।
यह रचना न केवल प्रकृति के संरक्षण का संदेश देती है, बल्कि हमें यह भी याद दिलाती है कि नदी ही हमारी सभ्यता और जीवन की आत्मा है।