रिश्तो की चुभन

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रिश्तो की चुभन


साथ चलते-चलते काँटे भी बो दिए गए, अपनों के ही लफ़्ज़ ज़हर जैसे हो गए। ममता की जगह आई तानों की चोट, सपनों की जगह बस रह गया खामोशी का बोझ।
: Writer Dev

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