कुदरत का कहर
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कुदरत का कहर
दैनिक प्रतियोगिता
छोटी कहानियां
जब प्रकृति अपने ग़ुस्से में आती है, तो इंसान की तमाम ताक़तें बौनी साबित हो जाती हैं। लेकिन क्या इंसान सचमुच कुदरत के कहर को झेलकर फिर से खड़ा हो पाएगा, या ये सिर्फ़ उसकी अगली चेतावनी है?”
: विजय सांगा
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