दशरथ मांझी, गया के एक साधारण मज़दूर थे। ग़रीबी और उपेक्षा में पले बढ़े मांझी की ज़िंदगी तब बदल गई, जब उनकी पत्नी इलाज न मिल पाने के कारण चल बसीं। अस्पताल तक जाने के लिए पहाड़ पार करना पड़ता था। उसी दर्द ने उन्हें ऐसा हौसला दिया कि उन्होंने अकेले हथौड़ा-छैनी से पहाड़ काटने की ठान ली।
22 वर्षों तक वे दिन रात पत्थरों से जूझते रहे। लोग मज़ाक उड़ाते, उन्हें “पागल” कहते, लेकिन मांझी का संकल्प अडिग रहा। धीरे धीरे पहाड़ टूटने लगा और एक सीधा रास्ता बन गया। इस रास्ते ने गाँव और शहर की दूरी 55 किलोमीटर से घटाकर 15 किलोमीटर कर दी।
उनकी मेहनत की गूँज पूरे देश में पहुँची और लोग उन्हें “माउंटेन मैन” कहने लगे। मांझी ने साबित कर दिया कि इंसान अगर ठान ले, तो असंभव भी संभव हो जाता है। उनका जीवन आज भी संघर्ष, समर्पण और इंसानी जज़्बे की सबसे बड़ी मिसाल है।