देवी की उम्र पैंसठ वर्ष थी। उनका चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ था, लेकिन आँखों में अब भी अजीब सी चमक रहती थी। शहर में उनका अपना कोई नहीं था। पति का देहांत पंद्रह साल पहले हो चुका था और इकलौता बेटा नौकरी के सिलसिले में विदेश चला गया था। शुरुआत में बेटा फ़ोन करता, चिट्ठियाँ भेजता, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत कम होती गई। राधा देवी का छोटा-सा मकान अब अकेलेपन की दीवारों से घिर गया था।
हर सुबह वह घर के बाहर लगे तुलसी के पौधे में पानी डालतीं, फिर आस-पड़ोस के बच्चों को खेलते देखतीं। उन बच्चों की खिलखिलाहट उन्हें बहुत भाती, मगर भीतर से एक कसक उठती—काश, उनका भी पोता या पोती पास होता।
इन्हीं दिनों उनकी मुलाक़ात हुई गुड़िया से। गुड़िया बारह साल की एक अनाथ लड़की थी, जो सामने वाले घर की नौकरानी के साथ रहती थी। गुड़िया के माता-पिता का देहांत एक सड़क हादसे में हो चुका था। गरीब रिश्तेदारों ने उसे अपनाने के बजाय मज़दूरी पर भेज दिया। सुबह से शाम तक वह घर-घर जाकर छोटे-मोटे काम करती, और रात को एक झोपड़ी में लौट आती।
एक दिन राधा देवी ने देखा कि गुड़िया गली के नल पर पानी भर रही है। भारी बाल्टी उठाते-उठाते उसका छोटा-सा हाथ छिल गया। राधा देवी का दिल पसीज गया। उन्होंने पास जाकर पूछा,
“बिटिया, इतना भारी क्यों उठा रही हो? चोट लग जाएगी।”
गुड़िया ने संकोच से मुस्कुराते हुए कहा,
“अम्मा, आदत हो गई है। और फिर... कोई तो करना ही पड़ेगा।”
उस मासूमियत में ऐसा दर्द छुपा था कि राधा देवी के दिल को चीर गया। उसी दिन से उन्होंने तय कर लिया कि गुड़िया को अपने पास बुलाएँगी।
धीरे-धीरे गुड़िया उनके घर आने लगी। कभी झाड़ू लगा देती, कभी बर्तन धो देती। बदले में राधा देवी उसे खाना खिलातीं, किताबें दिखातीं और कहानियाँ सुनातीं। गुड़िया को पहली बार ऐसा स्नेह मिला, जो माँ-बाप के जाने के बाद उसने कभी महसूस नहीं किया था।
एक दिन गुड़िया ने झिझकते हुए पूछा,
“अम्मा, क्या मैं भी स्कूल जा सकती हूँ?”
यह सुनते ही राधा देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने सोचा—जिस तरह उनका बेटा विदेश चला गया और अकेलापन छोड़ गया, शायद उसी खालीपन को यह बच्ची भर सकती है।
“हाँ बिटिया, क्यों नहीं! अब से तू मेरी जिम्मेदारी है।”
उस दिन से गुड़िया के जीवन की दिशा बदल गई। राधा देवी ने अपने गहनों को बेचकर उसकी पढ़ाई का इंतज़ाम किया। सुबह गुड़िया स्कूल जाती और शाम को राधा देवी के पास बैठकर पढ़ाई करती। बदले में वह राधा देवी का हर छोटा-बड़ा काम देखती। दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया, जो खून का नहीं था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा गहरा था।
समाज के लोग बातें बनाते—“राधा देवी क्यों इस पराई लड़की पर इतना खर्च कर रही हैं?”
परंतु उन्हें किसी की परवाह नहीं थी। उनके लिए गुड़िया केवल एक नौकरानी या सहारा नहीं, बल्कि बेटी से भी बढ़कर थी।
समय बीतता गया। गुड़िया पढ़ाई में तेज निकली। उसने दसवीं कक्षा में पूरे मोहल्ले में पहला स्थान प्राप्त किया। राधा देवी खुशी से रो पड़ीं। वह दिन उनके जीवन का सबसे सुनहरा दिन था।
अब मोहल्ले के लोग भी उनकी मिसाल देने लगे—“देखो, बूढ़ी माँ और अनाथ बच्ची का कैसा रिश्ता है! सचमुच अनोखा बंधन है।”
लेकिन जीवन में हर राह आसान कहाँ होती है। एक दिन राधा देवी की तबियत अचानक बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डॉक्टर ने कहा—“इनकी उम्र ज़्यादा है, देखभाल की बहुत ज़रूरत पड़ेगी।”
गुड़िया रो-रोकर बेहाल हो गई। वह दिन-रात अस्पताल में बैठकर उनकी सेवा करती रही। नर्सें हैरान थीं—इतनी छोटी लड़की किस तरह इतनी लगन से उनकी देखभाल कर रही है।
राधा देवी ने कमजोर आवाज़ में गुड़िया का हाथ पकड़कर कहा,
“बिटिया, तू मेरी दुनिया है। अगर मैं न रहूँ, तो तुझे अकेला नहीं होना चाहिए। मेरी अलमारी में कुछ पैसे और कागज़ हैं, सब तेरे नाम हैं। पढ़ाई पूरी करके एक अच्छा इंसान बनना।”
गुड़िया ने रोते हुए सिर झुका लिया,
“अम्मा, आप मुझे छोड़कर मत जाइए। मैं बिना आपके कैसे रहूँगी?”
कुछ महीनों की दवा और देखभाल से राधा देवी धीरे-धीरे ठीक होने लगीं। उन्हें देखकर गुड़िया की जान में जान आई।
अब दोनों पहले से भी ज़्यादा एक-दूसरे से जुड़ गए। मोहल्ले के लोग कहते—“ये रिश्ता भगवान ने बनाया है। माँ-बेटी का ऐसा बंधन है, जो जन्म से नहीं बल्कि दिल से बना है।”
गुड़िया ने पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई और कंप्यूटर का काम भी सीख लिया। वह चाहती थी कि राधा देवी पर और बोझ न डाले। धीरे-धीरे उसने छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और थोड़े पैसे कमाने लगी।
राधा देवी हर बार उसे देखकर गर्व से भर जातीं।
“बिटिया, तूने मेरा जीवन सफल कर दिया। अब मैं चैन से जी सकती हूँ।”
समय ने करवट बदली। गुड़िया कॉलेज पहुँची और अपनी मेहनत व लगन से स्कॉलरशिप हासिल की। वह वकील बनने का सपना देख रही थी। उसके हर कदम पर राधा देवी की दुआएँ साथ थीं।
एक दिन मोहल्ले में किसी ने कहा—
“अरे, राधा देवी का बेटा तो विदेश से वापस आ रहा है। अब देखना, वह माँ को अपने साथ ले जाएगा, तब यह लड़की कहाँ जाएगी?”
यह सुनकर गुड़िया का दिल डर से काँप उठा। मगर जब बेटा आया और माँ से मिला, तो उसने देखा कि उसकी जगह कोई और ले चुका है—गुड़िया।
पहले तो उसे यह अजीब लगा, पर जब उसने देखा कि उसकी माँ कितनी खुश है, तो उसने भी स्वीकार कर लिया।
“माँ, आपने सही किया। अगर गुड़िया न होती तो आप बिल्कुल अकेली पड़ जातीं।”
गुड़िया की आँखों में आँसू भर आए। उसने पहली बार महसूस किया कि दुनिया में लोग सिर्फ़ खून के रिश्तों से नहीं जुड़ते, दिल से भी परिवार बनता है।