छोटी-सी पुड़िया, रंग-बिरंगी मिठास,
बचपन का खज़ाना, दिल का अहसास।
जेब में रखे सिक्कों की खनक,
दुकान तक ले जाती हर धड़क।
काँच की शीशी में सजी कतार,
टॉफ़ी चुनते हम बार-बार।
लाल वाली सबसे लुभाती,
हरी वाली मुँह में रस बरसाती।
दोस्त से कहते — "आधी बाँट लेना",
फिर छुपके पूरी खुद ही खाना। 😄
मम्मी की डाँट — "दाँत खराब होंगे!",
पर हम तो कहते — "ये दिन कहाँ लौटेंगे?"
छोटी-सी टॉफ़ी, बड़ा था सुख,
हर कौर में छुपा बचपन का मुख।
यादों में अब भी वही मिठास बसती,
बचपन की टॉफ़ी — दिल को हँसती। 🍭