स्याही से बड़े तख्त नहीं तुम्हार%E

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स्याही से बड़े तख्त नहीं तुम्हार%E


यह कविता साहित्य में पक्षपात और अहंकार पर करारा व्यंग्य है। शब्दों की स्याही की ताक़त दिखाती है कि असली जीत इनाम से नहीं, पाठकों के दिलों से होती है।

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