सवैच्छिक
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सवैच्छिक
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
हर बात में ढूँढा जिसे मैंने अपना, वही कह गया अब "मैं तेरा क्या लगता हूँ?" वक़्त रुक सा गया है इन वीरान राहों में, तेरी हँसी की गूंज अब भी है इन हवाओं में।
: Writer Dev
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