परदेशी
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परदेशी
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
घर से दूर जाने वाले के एहसास और पीछे छूटे अपनों की तड़प को बयां करती यह कविता, परदेस और आंगन के बीच का भावनात्मक पुल बनाती है।
लेखक : विजय सांगा
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