छोड़ आया था वह अपना गाँव,
मिट्टी की खुशबू, बचपन के नाम।
माँ की पुकार, पिता का सहारा,
सब रह गए पीछे, दूर किनारा।
अजनबी गलियों में ढूँढता अपनापन,
हर चेहरे में खोजता बचपन का दर्पण।
भाषा नई, रीति-रिवाज़ अनजाने,
दिल के जख्म मगर वही पुराने।
रातों में तारे भी पूछते सवाल,
“कब लौटोगे तुम अपने गाँव के बाग़-बाग़िचाल?”
पर कर्तव्य की डोर कसकर बाँध लेती,
रोटी की महक उसे आगे खींच लेती।
फिर भी सपनों में, हर बार वही दृश्य आता,
जहाँ माँ आँगन में दीया जलाती नज़र आता।
परदेशी की आँखों में नमी, दिल में उमंग,
एक दिन लौटेगा — मिट्टी के संग।