कभी-कभी ज़िंदगी के बाद भी कहानियां सांस लेती हैं।
कब्र के पास रखे फूल सिर्फ़ चुप्पी के गवाह नहीं होते,
वे हंसी, आंसू, यादें और अधूरी बातें भी समेटे होते हैं।
यह कविता एक ऐसी रूह की है
जो अपनी कब्र से भी ज़िंदगी को
मुस्कुरा कर देखती है ...
रोते हुए भी, हंसते हुए भी…
जैसे मौत ने उसे ख़ामोश किया हो,
पर उसकी शरारत और अपनापन अब भी ज़िंदा हो ✍️