स्त्री: हर रूप में पूज्य है
यह कविता एक संवेदनशील प्रश्न उठाती है — जब स्त्री हर रूप में पूजनीय है, तो फिर बहू और बेटी के बीच भेदभाव क्यों?
हम नारी को देवी मानते हैं, लेकिन बहू बनते ही उसके हिस्से में अपेक्षाएं, चुप्पियाँ और तिरस्कार क्यों आ जाते हैं? इस कविता के माध्यम से मैंने उसी सामाजिक अंतर्द्वंद्व को उजागर करने का प्रयास किया है, जहाँ बहू को लक्ष्मी कहा जाता है, पर उसका आदर बेटियों जैसा नहीं होता।
जहाँ रिश्तों में प्रेम तो है, पर समानता नहीं।
कविता का संदेश सीधा है —जिस दिन हर स्त्री को समान दृष्टि से देखा जाएगा,
उसी दिन घरों में सुख, समृद्धि और सच्ची शांति लौट आएगी।
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