भूख न कोई मज़हब जाने,
न जात-पात का नाम पहचाने।
ना अमीर की दौलत देखे,
ना गरीब की साँसों को आँके।
रोटी की एक प्यासी नज़र,
कब किसे इंसान से जानवर कर दे,
कौन जाने उस बेचैन भूख को,
जो इज़्ज़त से पहले निवाला भर दे।
भूख है तो चेहरा फीका,
आँखों में बसी है इक दरार ग़रीबी की।
माँ ने खुद भूख को ओढ़ा,
पर रोटी बचा ली थी नन्ही सी जीवनी की।
वो बच्चा जो स्कूल न गया,
कचरे में ढूँढता जीवन का स्वाद,
पढ़ाई नहीं, उसे पहले चाहिए
एक रोटी… एक शांत रात।
क्या भूख सिर्फ़ रोटी की है?
नहीं, ये तो जीवन की पुकार है।
कोई भूखा है प्यार के लिए,
कोई भूखा है सत्कार के लिए।
कोई भूखा है ममता के लिए,
कोई अपनी अस्मिता के लिए,
और कोई भूखा है गरिमा के लिए,
जो बिक जाती है कभी रोटी के बदले।
भूख से बड़ा कोई धर्म नहीं,
भूख से बड़ा कोई कर्म नहीं।
जो भूखा है, वह केवल पेट नहीं,
वह सपने, आत्मा और वजूद से खाली है कहीं।
कभी भूख से मजबूर होकर,
माँ ने शरीर तक बेच दिया,
कभी भाई ने चोरी कर ली,
कभी बहन ने आत्मसम्मान से समझौता किया।
कितने रोटियाँ फेंकी जाती हैं,
कितनी थालियाँ बची रह जाती हैं।
और वहीं किसी कोने में कोई है,
जो सिर्फ़ एक कौर को तरस जाता है।
कभी आँकड़ों में भूख छिपी होती है,
कभी नेताओं की घोषणाओं में,
कभी योजनाओं की फाइलों में,
कभी वोट के भाषणों की तालियों में।
पर भूख कभी झूठ नहीं बोलती,
वो बच्चे की हड्डियों से दिखती है।
वो मज़दूर की खाल में उतरती है,
वो माँ की आँखों में चुपचाप बहती है।
भूख पर कई भाषण हुए,
कई योजनाएँ बनीं,
पर भूखा आदमी आज भी
रोटी के लिए चौराहे पर खड़ा है कहीं।
भूख मिट सकती है,
बस ज़रूरत है बाँटने की सोच की,
एक रोटी बचा ली जाए,
उन भूखे होठों की खोज में।
कभी खाना न फेंका जाए,
कभी अन्न दान जीवनदान बने,
कभी इंसानियत भूख से जीते,
और समाज फिर से इंसान बने।
भूख कोई अपराध नहीं,
पर किसी को भूखा रखना गुनाह है।
ये लड़ाई सिर्फ सरकार की नहीं,
ये लड़ाई हम सबकी राह है।
चलो, रोटी बनें किसी के लिए,
चलो, छाँव बनें किसी भूखे के लिए,
चलो, भूख को इतिहास बनाएँ,
और मानवता को फिर से अपनाएँ।
"भूख मिटे न केवल रोटी से,
बल्कि आत्मा की रौशनी से।
चलो, एक दिया जलाएँ,
और किसी भूखे का अंधेरा मिटाएँ।"