कीमत
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कीमत
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह कविता आज की दुनिया में इंसानी जज़्बातों और रिश्तों की गिरती "कीमत" पर गहरी चोट करती है। यह बताती है कि कैसे भावनाओं से ज़्यादा दिखावा और मतलब क़ीमती बन गया है।
: विजय सांगा
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