ज़ख्मों का दलदल

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ज़ख्मों का दलदल


यह सिर्फ एक कहानी नहीं… यह उन चीखों का दस्तावेज़ है जो कभी जुबान तक नहीं पहुँचीं। यह उन ज़ख्मों का हिसाब है, जो वक़्त ने नहीं… बल्कि अपनों ने दिए। जब रिश्ता दलदल बन जाए .. और हर मोड़ पर इंसान धंसता जाए, तो सांस लेना भी गुनाह लगने लगता है। यह कहानी उसी गुनाह की है… जिसे हर औरत ने सहा, पर कभी कहा नहीं।

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