जब जीवन हर कोने से टूटता है,
जब अपने भी अजनबी लगने लगते हैं,
जब हर राह धुंधली हो जाए और आत्मा थक जाए —
तभी कहीं भीतर, एक लौ जलती है...
ये कविता श्रृंखला उसी "लौ" की कहानी है। यह सिर्फ़ शब्दों की माला नहीं,
बल्कि उन टूटे हुए दिलों की आवाज़ है,
जो चुपचाप ज़िंदगी की सबसे काली रातों से गुज़रते हैं,
और फिर भी अगली सुबह उगाने की जिद नहीं छोड़ते।
“राख से उठती लौ” हर उस इंसान के लिए है —
जिसने कभी हार मानने की सोच ली थी,
पर फिर खुद ही खुद को थामा,
और अपने होसलों को बुलंद कर, फिर से खड़ा हुआ।
यह श्रृंखला आपको रुलाएगी, हँसाएगी, और सबसे ज़रूरी —
आपके भीतर छिपी उस "लौ" को फिर से जगाएगी,
जो शायद कभी बुझने के कगार पर थी।
तो आइए, इस यात्रा में साथ चलें...
जहाँ हर कविता एक क़दम है —
अंधेरे से उजाले की ओर।