यह कहानी है गरिमा की —
एक ऐसी लड़की की, जिसे पैदा होने से पहले ही नकार दिया गयाऔर फिर भी उसने अपने नाम को खुद इज़्ज़त दी।वह लड़की नहीं, एक सवाल बनकर आई —जो हर उस सोच को चुनौती देती हैजो आज भी बेटियों को गिनती में रखती है,और गरिमा जैसी बेटियाँ —अपनी पहचान "प्रमाणपत्रों" से नहीं,अपने हौसलों से बनाती हैं।