मैं भी बेटी थी

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मैं भी बेटी थी


एक चीख़, एक सवाल, एक सच…वो किसी पेड़ से नहीं झूली थी... उसे धकेला गया था, तब भी जब वो बार-बार कह रही थी — "मुझे मत छूना..." ये कविता एक लड़की की नहीं, उस हर बेटी की कहानी है, जिसे हम बचपन से कहते हैं — "धीरे चलो, ये दुनिया अच्छी नहीं है…" मगर सवाल ये है — दुनिया को अच्छा कौन बनाएगा? अब बेटी चीख़ नहीं रही... वो सवाल बन गई है।
: Slient girl

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