एक चीख़, एक सवाल, एक सच…वो किसी पेड़ से नहीं झूली थी...
उसे धकेला गया था, तब भी जब वो बार-बार कह रही थी — "मुझे मत छूना..."
ये कविता एक लड़की की नहीं, उस हर बेटी की कहानी है,
जिसे हम बचपन से कहते हैं —
"धीरे चलो, ये दुनिया अच्छी नहीं है…"
मगर सवाल ये है — दुनिया को अच्छा कौन बनाएगा?
अब बेटी चीख़ नहीं रही... वो सवाल बन गई है।