ना होगा मुकम्मल अपना मिलना

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ना होगा मुकम्मल अपना मिलना


यह कविता अधूरी मोहब्बत की भावनाओं को बयां करती है, जहां प्रेमिका अपने प्रेमी के शहर लौटने की कल्पना करती है। वो जानती है कि अगर उसने अपने प्रेमी को देख लिया तो और खुद को सम्भल नहीं पाएगी, और उनका मिलन ये दुनिया बर्दाश्त नहीं करेगी तो दूर रहना ही बेहतर है।

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