घूंघट मे
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घूंघट मे
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह कविता "घूंघट में" एक स्त्री की चुपचाप मौजूद सुंदरता, उसकी भावनाओं और आत्मसम्मान को नज़ाकत से बयां करती है। हर पंक्ति में घूंघट की आड़ में छुपे प्रेम, संकोच और गहराई का अहसास झलकता है।
: विजय सांगा
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