उलझी हुई जिंदगी
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उलझी हुई जिंदगी
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
बहुत उलझी हुई है जिंदगी मेरी , तुम खुद से संवार दो न , एक ठहराव की तलाश है मुझे , जिसकी राहें मुझे तुम्हारी ओर ले जाती है , जो मेरी खामोशी को समझ सके , मुझे हर हालात में सम्भाल सकें , जिसे मेरे रोने की वजह से लेकर , हंसने की वजह मालूम है ,
: Mahima
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